श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 27: त्रिजटा का स्वप्न, राक्षसों के विनाश और श्रीरघुनाथजी की विजय की शुभ सूचना  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  5.27.42 
प्रियां बहुमतां भार्यां वनवासमनुव्रताम्।
भर्त्सितां तर्जितां वापि नानुमंस्यति राघव:॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
नाथजी अपनी पतिव्रता पत्नी और प्रिय सीता को, जो वनवास में भी उनके साथ रही हैं, इस प्रकार धमकाया और डराया जाना कभी सहन नहीं करेंगे॥ 42॥
 
Nathji will never tolerate his faithful wife and beloved Sita, who has accompanied him even in his exile, being threatened and intimidated in this manner.॥ 42॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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