श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 26: सीता का करुण-विलाप तथा अपने प्राणों को त्याग देने का निश्चय करना  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  5.26.41 
दृश्यमाने भवेत् प्रीति: सौहृदं नास्त्यदृश्यत:।
नाशयन्ति कृतघ्नास्तु न रामो नाशयिष्यति॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
हम तो केवल उन्हीं स्वजनों से प्रेम करते हैं जो हमारी आँखों के सामने होते हैं। लोग उनसे प्रेम नहीं करते जो दृष्टि से ओझल हैं (शायद इसीलिए श्री रघुनाथजी मुझे भूल गए हैं, परन्तु यह भी संभव नहीं; क्योंकि) केवल कृतघ्न लोग ही पीठ पीछे प्रेम का तिरस्कार करते हैं। प्रभु श्री राम ऐसा नहीं करेंगे॥ 41॥
 
‘We love only those relatives who are in front of our eyes. People do not love those who are out of sight (perhaps this is why Shri Raghunath has forgotten me, but this is also not possible; because) only ungrateful people reject love behind your back. Lord Shri Ram will not do this.॥ 41॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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