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श्लोक  5.25.20 
धिगस्तु खलु मानुष्यं धिगस्तु परवश्यताम्।
न शक्यं यत् परित्यक्तुमात्मच्छन्देन जीवितम्॥ २०॥
 
 
अनुवाद
धिक्कार है इस मानव जीवन और गुलामी पर, जहां कोई अपनी इच्छा से अपना जीवन भी नहीं त्याग सकता।'
 
Shame on this human life and slavery, where one cannot even give up one's life according to one's own will.'
 
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे पञ्चविंश: सर्ग:॥ २५॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें पचीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २५॥
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)