श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 24: सीताजी का राक्षसियों की बात मानने से इनकार कर देना तथा राक्षसियों का उन्हें मारने-काट ने की धमकी देना  »  श्लोक 39-41h
 
 
श्लोक  5.24.39-41h 
इमां हरिणशावाक्षीं त्रासोत्कम्पपयोधराम्॥ ३९॥
रावणेन हृतां दृष्ट्वा दौर्हृदो मे महानयम्।
यकृत्प्लीहं महत् क्रोडं हृदयं च सबन्धनम्॥ ४०॥
गात्राण्यपि तथा शीर्षं खादेयमिति मे मति:।
 
 
अनुवाद
‘जब राजा रावण उसका हरण करके यहाँ लाया था, तब वह भय से काँप रही थी, जिससे उसके दोनों स्तन हिल रहे थे। उस दिन उस हिरणी के समान नेत्रों वाली मानव कन्या को देखकर मेरे हृदय में यह प्रबल इच्छा उत्पन्न हुई कि मैं उसका कलेजा, तिल्ली, विशाल वक्ष, हृदय, उसका मूलाधार, अन्य अंग और सिर खा जाऊँ। अब भी मेरा यही विचार है।’॥39-40 1/2॥
 
‘When King Ravana kidnapped her and brought her here, she was trembling in fear, due to which both her breasts were shaking. That day, on seeing this human girl with doe-like eyes, a strong desire arose in my heart that I should eat her liver, spleen, huge chest, heart, its base, other organs and head. I have the same thought even now.’॥ 39-40 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)