श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 24: सीताजी का राक्षसियों की बात मानने से इनकार कर देना तथा राक्षसियों का उन्हें मारने-काट ने की धमकी देना  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  5.24.33 
अलमश्रुनिपातेन त्यज शोकमनर्थकम्।
भज प्रीतिं प्रहर्षं च त्यजन्ती नित्यदैन्यताम्॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
आँसू बहाने से कुछ नहीं होगा। इस व्यर्थ शोक को त्याग दो। निरन्तर दुःख को दूर करो और अपने हृदय में सुख और आनन्द को स्थान दो॥ 33॥
 
‘Nothing is going to happen by shedding tears. Give up this useless mourning. Remove the constant misery and give place to happiness and joy in your heart.॥ 33॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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