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श्लोक 5.24.29  |
बहून्यप्रतिरूपाणि वचनानि सुदुर्मते।
अनुक्रोशान्मृदुत्वाच्च सोढानि तव मैथिलि॥ २९॥ |
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| अनुवाद |
| मिथिलेशाकुमारी, तुम्हारी बुद्धि बड़ी कुटिल है! अब तक हमने अपने कोमल स्वभाव के कारण तुम पर दया करके तुम्हारी बहुत सी अनुचित बातें सहन की हैं॥ 29॥ |
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| Mithileshakumari, you have a very crooked mind! Till now we have tolerated many of your inappropriate things because of our pity for you due to our gentle nature.॥ 29॥ |
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