श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 2: लंकापुरी का वर्णन, उसमें प्रवेश करने के विषय में हनुमान जी का विचार, उनका लघुरूप से पुरी में प्रवेश तथा चन्द्रोदय का वर्णन  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  5.2.8 
स तस्मिन्नचले तिष्ठन् वनान्युपवनानि च।
स नगाग्रे स्थितां लंकां ददर्श पवनात्मज:॥ ८॥
 
 
अनुवाद
उस पर्वत पर स्थित होकर पवनपुत्र हनुमान् ने बहुत से वन और उपवन देखे तथा उस पर्वत के अग्रभाग में स्थित लंका को भी देखा ॥8॥
 
Situated on that mountain, Hanuman, the son of the wind, saw many forests and groves and also observed Lanka situated in the front part of that mountain. ॥ 8॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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