|
| |
| |
श्लोक 5.2.58  |
शङ्खप्रभं क्षीरमृणालवर्ण-
मुद्गच्छमानं व्यवभासमानम्।
ददर्श चन्द्रं स कपिप्रवीर:
पोप्लूयमानं सरसीव हंसम्॥ ५८॥ |
| |
| |
| अनुवाद |
| वानरों के प्रधान वीर श्री हनुमान्जी ने शंख के समान चमकने वाले तथा दूध और छाछ के समान रंग वाले चन्द्रमा को आकाश में इस प्रकार चमकते और उठते देखा, मानो कोई हंस सरोवर में तैर रहा हो॥58॥ |
| |
| The brave Shri Hanuman ji, the chief of the monkeys, saw the moon shining like a conch and having the color of milk and buttermilk rising and shining in the sky in such a way as if a swan was swimming in a lake. 58॥ |
| |
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे द्वितीय: सर्ग:॥ २॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें दूसरा सर्ग पूरा हुआ॥ २॥ |
| |
| ✨ ai-generated |
| |
|