श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 2: लंकापुरी का वर्णन, उसमें प्रवेश करने के विषय में हनुमान जी का विचार, उनका लघुरूप से पुरी में प्रवेश तथा चन्द्रोदय का वर्णन  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  5.2.48 
इति निश्चित्य हनुमान् सूर्यस्यास्तमयं कपि:।
आचकाङ्क्षे तदा वीरो वैदेह्या दर्शनोत्सुक:॥ ४८॥
 
 
अनुवाद
ऐसा निश्चय करके वीर वानर हनुमान्‌जी विदेहनन्दिनी के दर्शन के लिए उत्सुक होकर सूर्यास्त की प्रतीक्षा करने लगे ॥48॥
 
Having decided this, the brave monkey Hanuman, eager to see Videhanandini, started waiting for sunset. 48॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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