श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 2: लंकापुरी का वर्णन, उसमें प्रवेश करने के विषय में हनुमान जी का विचार, उनका लघुरूप से पुरी में प्रवेश तथा चन्द्रोदय का वर्णन  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक  5.2.46 
तदहं स्वेन रूपेण रजन्यां ह्रस्वतां गत:।
लंकामभिपतिष्यामि राघवस्यार्थसिद्धये॥ ४६॥
 
 
अनुवाद
‘इसलिए श्री रघुनाथजी का कार्य सिद्ध करने के लिए मैं इसी रूप में छोटा शरीर धारण करके रात्रि के समय लंका में प्रवेश करूँगा॥ 46॥
 
‘Therefore, to accomplish the task of Sri Raghunathji, I will enter Lanka at night in this form, taking a small body.॥ 46॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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