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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
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काण्ड 5: सुन्दर काण्ड
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सर्ग 2: लंकापुरी का वर्णन, उसमें प्रवेश करने के विषय में हनुमान जी का विचार, उनका लघुरूप से पुरी में प्रवेश तथा चन्द्रोदय का वर्णन
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श्लोक 45
श्लोक
5.2.45
इहाहं यदि तिष्ठामि स्वेन रूपेण संवृत:।
विनाशमुपयास्यामि भर्तुरर्थश्च हास्यति॥ ४५॥
अनुवाद
यदि मैं इस रूप में यहाँ छिपकर रहूँ तो मारा जाऊँगा और मेरे स्वामी के कार्य में भी हानि होगी ॥ 45॥
If I stay here hidden in this form, I will be killed and my master's work will also be harmed. ॥ 45॥
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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