श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 2: लंकापुरी का वर्णन, उसमें प्रवेश करने के विषय में हनुमान जी का विचार, उनका लघुरूप से पुरी में प्रवेश तथा चन्द्रोदय का वर्णन  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक  5.2.43 
नहि शक्यं क्वचित् स्थातुमविज्ञातेन राक्षसै:।
अपि राक्षसरूपेण किमुतान्येन केनचित्॥ ४३॥
 
 
अनुवाद
यहाँ अन्य किसी भी रूप की बात तो छोड़ ही दीजिए, यदि कोई राक्षस का रूप भी धारण कर ले तो भी राक्षसों से अनभिज्ञ हुए बिना कहीं भी रहना असम्भव है ॥ 43॥
 
‘Forget about any other form here, even if one assumes the form of a demon it is impossible to remain anywhere without being ignorant of the demons. ॥ 43॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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