श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 2: लंकापुरी का वर्णन, उसमें प्रवेश करने के विषय में हनुमान जी का विचार, उनका लघुरूप से पुरी में प्रवेश तथा चन्द्रोदय का वर्णन  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  5.2.40 
अर्थानर्थान्तरे बुद्धिर्निश्चितापि न शोभते।
घातयन्तीह कार्याणि दूता: पण्डितमानिन:॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
राजा और मन्त्रियों द्वारा निश्चित किया गया कर्तव्य-विषयक विचार भी, यदि वे अविवेकपूर्ण दूत की शरण में जाते हैं, तो सफल नहीं होता। जो अविवेकपूर्ण दूत अपने को विद्वान् समझता है, वह सम्पूर्ण कार्य को नष्ट कर देता है॥40॥
 
‘Even the deliberations on duty decided by the king and the ministers do not succeed if they take recourse to an indiscreet messenger. An indiscreet messenger who considers himself learned, ruins the entire work.॥ 40॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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