श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 2: लंकापुरी का वर्णन, उसमें प्रवेश करने के विषय में हनुमान जी का विचार, उनका लघुरूप से पुरी में प्रवेश तथा चन्द्रोदय का वर्णन  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  5.2.37 
केनोपायेन पश्येयं मैथिलीं जनकात्मजाम्।
अदृष्टो राक्षसेन्द्रेण रावणेन दुरात्मना॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
‘मैं कौन-सा उपाय अपनाऊँ जिससे मैं दुष्ट बुद्धि वाले राक्षसराज रावण की दृष्टि से छिपकर मिथिला की पुत्री जनकपुत्री सीता का दर्शन प्राप्त कर सकूँ?॥ 37॥
 
‘What method should I adopt so that I can get the darshan of Janak's daughter Sita, the daughter of Mithila, while remaining hidden from the sight of the evil-minded demon king Ravana?॥ 37॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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