श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 2: लंकापुरी का वर्णन, उसमें प्रवेश करने के विषय में हनुमान जी का विचार, उनका लघुरूप से पुरी में प्रवेश तथा चन्द्रोदय का वर्णन  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  5.2.34 
महौजसो महावीर्या बलवन्तश्च राक्षसा:।
वञ्चनीया मया सर्वे जानकीं परिमार्गता॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
जानकीजी की खोज करते समय मुझे यहाँ के समस्त बलवान, बलवान और बलवान राक्षसों की दृष्टि से छिपना पड़ेगा॥ 34॥
 
While searching for Janaki I will have to hide myself from the eyes of all the mighty, powerful and strong demons here.॥ 34॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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