श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 2: लंकापुरी का वर्णन, उसमें प्रवेश करने के विषय में हनुमान जी का विचार, उनका लघुरूप से पुरी में प्रवेश तथा चन्द्रोदय का वर्णन  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  5.2.26 
तस्याश्च महतीं गुप्तिं सागरं च निरीक्ष्य स:।
रावणं च रिपुं घोरं चिन्तयामास वानर:॥ २६॥
 
 
अनुवाद
उस नगर में भारी सुरक्षा, चारों ओर समुद्र की खाइयाँ और रावण जैसे भयंकर शत्रु को देखकर हनुमानजी इस प्रकार विचार करने लगे-॥26॥
 
Seeing the heavy security in that city, the sea-ditch all around it, and a fearsome enemy like Ravana, Hanumanji began to think thus -॥ 26॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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