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श्लोक  5.19.17 
सुकुमारीं सुजातांगीं रत्नगर्भगृहोचिताम्।
तप्यमानामिवोष्णेन मृणालीमचिरोद‍्धृताम्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
उसके अंग अत्यंत कोमल और सुंदर थे। वह रत्नजटित महल में रहने के योग्य थी; किन्तु उसकी दशा उस कमल पुष्प के समान दयनीय थी जो ताप से झुलसकर तुरन्त गिर गया हो।
 
Her limbs were very delicate and beautiful. She was fit to live in a jeweled palace; but she was in a pitiable state like a lotus flower scorched by the heat and thrown away immediately.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)