श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 16: हनुमान जी का मन-ही-मन सीताजी के शील और सौन्दर्य की सराहना करते हुए उन्हें कष्ट में पड़ी देख स्वयं भी उनके लिये शोक करना  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  5.16.31 
अस्या हि पुष्पावनताग्रशाखा:
शोकं दृढं वै जनयन्त्यशोका:।
हिमव्यपायेन च शीतरश्मि-
रभ्युत्थितो नैकसहस्ररश्मि:॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
जिनकी शाखाएँ फूलों के भार से झुक गई हैं, वे अशोक वृक्ष इस समय सीता देवी को महान दुःख पहुँचा रहे हैं। तथा शीत ऋतु के समाप्त होने पर वसन्त ऋतु की रात्रि में उदय हुए चन्द्रदेव भी अपनी शीतल किरणों से उन्हें सहस्रों किरणों से प्रकाशित होने वाले सूर्यदेव के समान दुःख पहुँचा रहे हैं।॥31॥
 
The Ashoka trees, whose branches have bent down under the weight of the flowers, are causing great grief to Sita Devi at this time. And the Moon God with its cool rays, which has risen in the night of spring after the winter has ended, is also causing pain to them like the Sun God shining with thousands of rays.'॥ 31॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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