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ramayan 5.16.24: वे अपने स्वजनों से अलग हो गए हैं और केवल भगवान श्री रामचन्द्रजी से मिलने की आशा से तथा विषय-भोगों को प्रणाम करते हुए शरीर धारण किए हुए हैं॥24॥   |   ramayan सर्ग 5.16: हनुमान जी का मन-ही-मन सीताजी के शील और सौन्दर्य की सराहना करते हुए उन्हें कष्ट में पड़ी देख स्वयं भी उनके लिये शोक करना   ।   ramayan काण्ड 5: सुन्दर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 16: हनुमान जी का मन-ही-मन सीताजी के शील और सौन्दर्य की सराहना करते हुए उन्हें कष्ट में पड़ी देख स्वयं भी उनके लिये शोक करना  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  5.16.24 
कामभोगै: परित्यक्ता हीना बन्धुजनेन च।
धारयत्यात्मनो देहं तत्समागमकाङ्क्षिणी॥ २४॥
 
 
अनुवाद
वे अपने स्वजनों से अलग हो गए हैं और केवल भगवान श्री रामचन्द्रजी से मिलने की आशा से तथा विषय-भोगों को प्रणाम करते हुए शरीर धारण किए हुए हैं॥24॥
 
They have separated from their relatives and are holding their bodies only with the hope of meeting Lord Shri Ramchandraji and paying obeisance to the sensual pleasures. 24॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)