Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
ramayan 5.16.20: 'यहाँ आकर वह फल-मूल खाकर संतुष्ट रही और पति की सेवा करती रही तथा वन में भी उतनी ही प्रसन्न रही, जितनी राजमहल में रहती थी।   |   ramayan सर्ग 5.16: हनुमान जी का मन-ही-मन सीताजी के शील और सौन्दर्य की सराहना करते हुए उन्हें कष्ट में पड़ी देख स्वयं भी उनके लिये शोक करना   ।   ramayan काण्ड 5: सुन्दर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 16: हनुमान जी का मन-ही-मन सीताजी के शील और सौन्दर्य की सराहना करते हुए उन्हें कष्ट में पड़ी देख स्वयं भी उनके लिये शोक करना  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  5.16.20 
संतुष्टा फलमूलेन भर्तृशुश्रूषणापरा।
या परां भजते प्रीतिं वनेऽपि भवने यथा॥ २०॥
 
 
अनुवाद
'यहाँ आकर वह फल-मूल खाकर संतुष्ट रही और पति की सेवा करती रही तथा वन में भी उतनी ही प्रसन्न रही, जितनी राजमहल में रहती थी।
 
‘Having come here, she remained content with fruits and roots and continued to serve her husband and remained as happy in the forest as she used to be in the royal palace.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)