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ramayan 5.15.6: पवनपुत्र हनुमान उस अशोक वृक्ष पर बैठकर उस जगमगाते बगीचे को निहार रहे थे। वहाँ पक्षी बार-बार बगीचे से पत्ते और शाखाएँ तोड़ रहे थे।   |   ramayan सर्ग 5.15: वन की शोभा देखते हुए हनुमान जी का एक चैत्यप्रासाद (मन्दिर) के पास सीता को दयनीय अवस्था में देखना, पहचानना और प्रसन्न होना   ।   ramayan काण्ड 5: सुन्दर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 15: वन की शोभा देखते हुए हनुमान जी का एक चैत्यप्रासाद (मन्दिर) के पास सीता को दयनीय अवस्था में देखना, पहचानना और प्रसन्न होना  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  5.15.6 
प्रदीप्तामिव तत्रस्थो मारुति: समुदैक्षत।
निष्पत्रशाखां विहगै: क्रियमाणामिवासकृत्॥ ६॥
 
 
अनुवाद
पवनपुत्र हनुमान उस अशोक वृक्ष पर बैठकर उस जगमगाते बगीचे को निहार रहे थे। वहाँ पक्षी बार-बार बगीचे से पत्ते और शाखाएँ तोड़ रहे थे।
 
Hanuman, the son of the wind, sat on that Ashoka tree and looked at that sparkling garden. The birds there were repeatedly depriving the garden of leaves and branches. 6.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)