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ramayan 5.15.33-34: वे संदिग्ध अर्थ की स्मृतियों, भूमि पर गिरा हुआ धन, टूटा हुआ विश्वास, बिखरी हुई आशाएँ, विघ्नों से बाधित सफलता, कलंकित बुद्धि और मिथ्या आरोपों से कलंकित कीर्ति के समान प्रतीत होते थे ॥33-34॥   |   ramayan सर्ग 5.15: वन की शोभा देखते हुए हनुमान जी का एक चैत्यप्रासाद (मन्दिर) के पास सीता को दयनीय अवस्था में देखना, पहचानना और प्रसन्न होना   ।   ramayan काण्ड 5: सुन्दर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 15: वन की शोभा देखते हुए हनुमान जी का एक चैत्यप्रासाद (मन्दिर) के पास सीता को दयनीय अवस्था में देखना, पहचानना और प्रसन्न होना  »  श्लोक 33-34
 
 
श्लोक  5.15.33-34 
तां स्मृतीमिव संदिग्धामृद्धिं निपतितामिव।
विहतामिव च श्रद्धामाशां प्रतिहतामिव॥ ३३॥
सोपसर्गां यथा सिद्धिं बुद्धिं सकलुषामिव।
अभूतेनापवादेन कीर्तिं निपतितामिव॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
वे संदिग्ध अर्थ की स्मृतियों, भूमि पर गिरा हुआ धन, टूटा हुआ विश्वास, बिखरी हुई आशाएँ, विघ्नों से बाधित सफलता, कलंकित बुद्धि और मिथ्या आरोपों से कलंकित कीर्ति के समान प्रतीत होते थे ॥33-34॥
 
They appeared like memories of doubtful meaning, wealth fallen on the ground, broken faith, shattered hopes, success hampered by obstacles, tainted intellect and fame tarnished by false accusations. ॥33-34॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)