श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 15: वन की शोभा देखते हुए हनुमान जी का एक चैत्यप्रासाद (मन्दिर) के पास सीता को दयनीय अवस्था में देखना, पहचानना और प्रसन्न होना  »  श्लोक 11-12h
 
 
श्लोक  5.15.11-12h 
नन्दनं विबुधोद्यानं चित्रं चैत्ररथं यथा॥ ११॥
अतिवृत्तमिवाचिन्त्यं दिव्यं रम्यश्रियायुतम्।
 
 
अनुवाद
वह अशोक वन नंदन के समान आनन्ददायक, कुबेर के चैत्ररथ वन के समान विचित्र तथा उन दोनों से भी बढ़कर अकल्पनीय, दिव्य और रमणीय सौन्दर्य से परिपूर्ण था ॥11 1/2॥
 
That Ashoka forest was as pleasurable as Nandan, as strange as Kuber's Chaitrarath forest, and more than both of them, it was full of unimaginable, divine and delightful beauty. 11 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)