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ramayan 5.13.42: अथवा जब मैं प्राणपर्यन्त उपवास करने के लिए बैठूँगा और लिंग रूपी शरीर में स्थित आत्मा को पृथक करने का प्रयत्न करूँगा, तब मेरे शरीर को कौवे आदि जंगली पशु खाएँगे।॥ 42॥   |   ramayan सर्ग 5.13: सीताजी के नाश की आशंका से हनुमान्जी की चिन्ता, श्रीराम को सीता के न मिलने की सचना देने से अनर्थ की सम्भावना देख हनुमान का पुनः खोजने का विचार करना   ।   ramayan काण्ड 5: सुन्दर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 13: सीताजी के नाश की आशंका से हनुमान्जी की चिन्ता, श्रीराम को सीता के न मिलने की सचना देने से अनर्थ की सम्भावना देख हनुमान का पुनः खोजने का विचार करना  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  5.13.42 
उपविष्टस्य वा सम्यग् लिंगिनं साधयिष्यत:।
शरीरं भक्षयिष्यन्ति वायसा: श्वापदानि च॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
अथवा जब मैं प्राणपर्यन्त उपवास करने के लिए बैठूँगा और लिंग रूपी शरीर में स्थित आत्मा को पृथक करने का प्रयत्न करूँगा, तब मेरे शरीर को कौवे आदि जंगली पशु खाएँगे।॥ 42॥
 
‘Or, while sitting down to fast till death and trying to separate the soul in the body of a Linga, my body will be eaten by crows and other wild animals.॥ 42॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)