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श्लोक 5.12.3  |
सा राक्षसानां प्रवरेण जानकी
स्वशीलसंरक्षणतत्परा सती।
अनेन नूनं प्रति दुष्टकर्मणा
हता भवेदार्यपथे परे स्थिता॥ ३॥ |
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| अनुवाद |
| सती-साध्वी सीता उत्तम मार्ग पर चलने वाली थीं। वे अपने शील और सदाचार की रक्षा में सदैव तत्पर रहती थीं; इसलिए इस दुष्ट राक्षसराज ने अवश्य ही उनका वध किया होगा॥3॥ |
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| ‘Sati-sadhvi Sita was one who followed the noble path. She was always alert in protecting her modesty and good conduct; therefore this wicked demon king must have surely killed her.॥ 3॥ |
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