श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 12: सीता के मरण की आशंका से हनुमान्जी का शिथिल होना, फिर उत्साह का आश्रय ले उनकी खोज करना और कहीं भी पता न लगने से पुनः उनका चिन्तित होना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  5.12.3 
सा राक्षसानां प्रवरेण जानकी
स्वशीलसंरक्षणतत्परा सती।
अनेन नूनं प्रति दुष्टकर्मणा
हता भवेदार्यपथे परे स्थिता॥ ३॥
 
 
अनुवाद
सती-साध्वी सीता उत्तम मार्ग पर चलने वाली थीं। वे अपने शील और सदाचार की रक्षा में सदैव तत्पर रहती थीं; इसलिए इस दुष्ट राक्षसराज ने अवश्य ही उनका वध किया होगा॥3॥
 
‘Sati-sadhvi Sita was one who followed the noble path. She was always alert in protecting her modesty and good conduct; therefore this wicked demon king must have surely killed her.॥ 3॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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