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श्लोक 5.11.45  |
तदिदं मार्गितं तावच्छुद्धेन मनसा मया।
रावणान्त:पुरं सर्वं दृश्यते न च जानकी॥ ४५॥ |
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| अनुवाद |
| अतः मैंने शुद्ध हृदय से रावण के सम्पूर्ण अन्तःकक्ष की खोज की है; किन्तु मुझे यहाँ जानकी नहीं दिखी।' |
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| Therefore I have searched the entire inner chamber of Ravana with a pure heart; but I do not see Janaki here.' |
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