श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 11: हनुमान जी का पुनः अन्तःपुर में और उसकी पानभूमि में सीता का पता लगाना, धर्मलोप की आशंका और स्वतः उसका निवारण होना  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  5.11.42 
मनो हि हेतु: सर्वेषामिन्द्रियाणां प्रवर्तने।
शुभाशुभास्ववस्थासु तच्च मे सुव्यवस्थितम्॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
‘मन ही समस्त इन्द्रियों को शुभ-अशुभ परिस्थितियों में प्रेरित करने का कारण है; परंतु मेरा मन पूर्णतया स्थिर है (इसमें किसी भी वस्तु के प्रति राग-द्वेष नहीं है; इसलिए परस्त्री को देखने से मेरा धर्म नष्ट नहीं हो सकता)॥ 42॥
 
‘The mind is the cause of inspiring all the senses to engage in auspicious and inauspicious situations; but my mind is completely stable (it has no attachment or aversion to anything; therefore my seeing another woman cannot cause me to lose my Dharma).॥ 42॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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