श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 11: हनुमान जी का पुनः अन्तःपुर में और उसकी पानभूमि में सीता का पता लगाना, धर्मलोप की आशंका और स्वतः उसका निवारण होना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  5.11.3 
नान्यं नरमुपस्थातुं सुराणामपि चेश्वरम्।
न हि रामसम: कश्चिद् विद्यते त्रिदशेष्वपि॥ ३॥
 
 
अनुवाद
वह किसी अन्य पुरुष के पास नहीं जा सकती, चाहे वह देवों का भी देव क्यों न हो। देवताओं में भी कोई ऐसा नहीं है जो श्री रामचंद्रजी की बराबरी कर सके॥3॥
 
‘She cannot go to any other person, even if he is the God of gods. There is no one even among the gods who can match Shri Ramchandraji.॥ 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)