श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 1: हनुमान् जी के द्वारा समुद्र का लङ्घन, मैनाक के द्वारा उनका स्वागत, सुरसा पर उनकी विजय तथा सिंहिका का वध,लंका की शोभा देखना  »  श्लोक 94
 
 
श्लोक  5.1.94 
तिर्यगूर्ध्वमधश्चैव शक्तिस्ते शैल वर्धितुम्।
तस्मात् संचोदयामि त्वामुत्तिष्ठ गिरिसत्तम॥ ९४॥
 
 
अनुवाद
शैल! तुम सब दिशाओं में, ऊपर-नीचे और एक ओर से दूसरी ओर जाने की शक्ति रखते हो। हे पर्वतश्रेष्ठ! इसलिए मैं तुम्हें ऊपर की ओर उठने की आज्ञा देता हूँ॥ 94॥
 
‘Shail! You have the power to move in all directions, up and down and side to side. O best of the mountains! That is why I command you to rise upwards.॥ 94॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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