श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 1: हनुमान् जी के द्वारा समुद्र का लङ्घन, मैनाक के द्वारा उनका स्वागत, सुरसा पर उनकी विजय तथा सिंहिका का वध,लंका की शोभा देखना  »  श्लोक 89
 
 
श्लोक  5.1.89 
अहमिक्ष्वाकुनाथेन सगरेण विवर्धित:।
इक्ष्वाकुसचिवश्चायं तन्नार्हत्यवसादितुम्॥ ८९॥
 
 
अनुवाद
'इक्ष्वाकु वंश के महाराज सगर ने मुझे प्रोत्साहित किया था। इस समय हनुमानजी भी इक्ष्वाकु वंश के वीर श्री रघुनाथजी की सहायता कर रहे हैं, अतः उन्हें इस यात्रा में किसी प्रकार की कठिनाई न हो।' 89.
 
‘Maharaja Sagara of the Ikshwaku clan had encouraged me. At this time Hanumanji is also helping the brave Sri Raghunathji of the Ikshwaku clan, so he should not face any kind of difficulty in this journey. 89.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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