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ramayan 5.1.88: यदि मैं वानरराज हनुमान् की सहायता न करूँ, तो बोलने की इच्छा रखनेवाले सब लोगों की दृष्टि में मैं सर्वथा निन्दनीय हो जाऊँगा ॥88॥   |   ramayan सर्ग 5.1: हनुमान् जी के द्वारा समुद्र का लङ्घन, मैनाक के द्वारा उनका स्वागत, सुरसा पर उनकी विजय तथा सिंहिका का वध,लंका की शोभा देखना   ।   ramayan काण्ड 5: सुन्दर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 1: हनुमान् जी के द्वारा समुद्र का लङ्घन, मैनाक के द्वारा उनका स्वागत, सुरसा पर उनकी विजय तथा सिंहिका का वध,लंका की शोभा देखना  »  श्लोक 88
 
 
श्लोक  5.1.88 
साहाय्यं वानरेन्द्रस्य यदि नाहं हनूमत:।
करिष्यामि भविष्यामि सर्ववाच्यो विवक्षताम्॥ ८८॥
 
 
अनुवाद
यदि मैं वानरराज हनुमान् की सहायता न करूँ, तो बोलने की इच्छा रखनेवाले सब लोगों की दृष्टि में मैं सर्वथा निन्दनीय हो जाऊँगा ॥88॥
 
If I do not help Hanuman, the King of the Monkeys, then I will become totally condemnable in the eyes of all those who wish to speak. ॥ 88॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)