श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 1: हनुमान् जी के द्वारा समुद्र का लङ्घन, मैनाक के द्वारा उनका स्वागत, सुरसा पर उनकी विजय तथा सिंहिका का वध,लंका की शोभा देखना  »  श्लोक 87
 
 
श्लोक  5.1.87 
तस्मिन् प्लवगशार्दूले प्लवमाने हनूमति।
इक्ष्वाकुकुलमानार्थी चिन्तयामास सागर:॥ ८७॥
 
 
अनुवाद
जब कपिकेशरी हनुमान समुद्र पार कूद रहे थे, तब समुद्र ने इक्ष्वाकु वंश का सम्मान करने की इच्छा से सोचा -
 
When Kapikesari Hanuman was jumping across the ocean, the ocean, wishing to honour the Ikshvaku clan, thought -
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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