श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 1: हनुमान् जी के द्वारा समुद्र का लङ्घन, मैनाक के द्वारा उनका स्वागत, सुरसा पर उनकी विजय तथा सिंहिका का वध,लंका की शोभा देखना  »  श्लोक 86
 
 
श्लोक  5.1.86 
नागाश्च तुष्टुवुर्यक्षा रक्षांसि विविधानि च।
प्रेक्ष्य सर्वे कपिवरं सहसा विगतक्लमम्॥ ८६॥
 
 
अनुवाद
उस कपिष्ठ को बिना थके आगे बढ़ते देख नाग, यक्ष और नाना प्रकार के राक्षस सब उसकी स्तुति करने लगे ॥86॥
 
Seeing that Kapisheshtha moving ahead without any fatigue, the serpents, Yakshas and various types of demons all started praising him. 86॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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