श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 1: हनुमान् जी के द्वारा समुद्र का लङ्घन, मैनाक के द्वारा उनका स्वागत, सुरसा पर उनकी विजय तथा सिंहिका का वध,लंका की शोभा देखना  »  श्लोक 82
 
 
श्लोक  5.1.82 
प्रविशन्नभ्रजालानि निष्पतंश्च पुन: पुन:।
प्रच्छन्नश्च प्रकाशश्च चन्द्रमा इव दृश्यते॥ ८२॥
 
 
अनुवाद
वह बार-बार बादलों में प्रवेश करता और बाहर निकलता था। इस प्रकार छिपता और प्रकाशित होता हुआ वह चन्द्रमा के समान प्रतीत होता था। 82.
 
He would repeatedly enter and come out of the clouds. Thus, hiding and appearing illuminated, he would appear like the moon. 82.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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