श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 1: हनुमान् जी के द्वारा समुद्र का लङ्घन, मैनाक के द्वारा उनका स्वागत, सुरसा पर उनकी विजय तथा सिंहिका का वध,लंका की शोभा देखना  »  श्लोक 76
 
 
श्लोक  5.1.76 
दशयोजनविस्तीर्णा त्रिंशद्योजनमायता।
छाया वानरसिंहस्य जवे चारुतराभवत्॥ ७६॥
 
 
अनुवाद
कपिकेशरी हनुमानजी की दस योजन चौड़ी और तीस योजन लम्बी छाया अपने वेग के कारण अत्यंत सुन्दर प्रतीत हो रही थी।
 
The ten yojana wide and thirty yojana long shadow of Kapikesari Hanumanji appeared extremely beautiful due to its speed. 76.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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