श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 1: हनुमान् जी के द्वारा समुद्र का लङ्घन, मैनाक के द्वारा उनका स्वागत, सुरसा पर उनकी विजय तथा सिंहिका का वध,लंका की शोभा देखना  »  श्लोक 60
 
 
श्लोक  5.1.60 
मुखं नासिकया तस्य ताम्रया ताम्रमाबभौ।
संध्यया समभिस्पृष्टं यथा स्यात् सूर्यमण्डलम्॥ ६०॥
 
 
अनुवाद
लाल नासिका के कारण उसका सम्पूर्ण मुख लाल था, और इसलिए वह सूर्य और संध्या के सूर्य के समान सुन्दर प्रतीत हो रहा था ॥60॥
 
His whole face was red due to his red nostrils, and hence it looked as beautiful as the sun combined with the evening sun. ॥ 60॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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