श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 1: हनुमान् जी के द्वारा समुद्र का लङ्घन, मैनाक के द्वारा उनका स्वागत, सुरसा पर उनकी विजय तथा सिंहिका का वध,लंका की शोभा देखना  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  5.1.57 
पिबन्निव बभौ चापि सोर्मिजालं महार्णवम्।
पिपासुरिव चाकाशं ददृशे स महाकपि:॥ ५७॥
 
 
अनुवाद
उस समय महाकपि हनुमान्‌जी ऐसे प्रतीत हो रहे थे मानो वे समुद्र को उसकी लहरों सहित पी रहे हों। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो वे आकाश को भी पी जाना चाहते हों॥57॥
 
At that time the great ape Hanuman appeared as if he was drinking the ocean with its waves. He appeared as if he wanted to drink the sky as well. ॥ 57॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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