श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 1: हनुमान् जी के द्वारा समुद्र का लङ्घन, मैनाक के द्वारा उनका स्वागत, सुरसा पर उनकी विजय तथा सिंहिका का वध,लंका की शोभा देखना  »  श्लोक 53
 
 
श्लोक  5.1.53 
लघुत्वेनोपपन्नं तद् विचित्रं सागरेऽपतत्।
द्रुमाणां विविधं पुष्पं कपिवायुसमीरितम्।
ताराचितमिवाकाशं प्रबभौ स महार्णव:॥ ५३॥
 
 
अनुवाद
हनुमानजी के शरीर से उठने वाली वायु से प्रेरित होकर नाना प्रकार के वृक्षों के पुष्प अत्यंत हल्के होने के कारण समुद्र में गिरकर डूबते नहीं थे। इसी कारण उनमें अद्वितीय शोभा थी। उन पुष्पों के कारण वह समुद्र तारों से भरे आकाश के समान शोभायमान हो रहा था॥53॥
 
Inspired by the wind rising from Hanuman's body, the flowers of various trees, being very light, did not sink when they fell into the ocean. That is why they had a unique beauty. Because of those flowers, that ocean looked as beautiful as a sky full of stars. ॥ 53॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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