श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 1: हनुमान् जी के द्वारा समुद्र का लङ्घन, मैनाक के द्वारा उनका स्वागत, सुरसा पर उनकी विजय तथा सिंहिका का वध,लंका की शोभा देखना  »  श्लोक 52
 
 
श्लोक  5.1.52 
विमुक्तास्तस्य वेगेन मुक्त्वा पुष्पाणि ते द्रुमा:।
व्यवशीर्यन्त सलिले निवृत्ता: सुहृदो यथा॥ ५२॥
 
 
अनुवाद
जब ये वृक्ष हनुमानजी के बल से मुक्त हो जाते (उनके आकर्षण से मुक्त हो जाते) तब अपने पुष्पों को गिराते हुए समुद्र के जल में डूब जाते, जैसे मित्र के घर के लोग दूर देश से अपने सम्बन्धी को विदा करके लौट आते हैं ॥ 52॥
 
When these trees were freed from the force of Hanuman (were released from his attraction), they would drown in the water of the ocean while shedding their flowers, just as the people of a friendly home return after escorting their relative to a faraway land. ॥ 52॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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