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श्लोक  5.1.34 
तस्य लाङ्गूलमाविद्धमतिवेगस्य पृष्ठत:।
ददृशे गरुडेनेव ह्रियमाणो महोरग:॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
अत्यंत वेगवान हनुमानजी के पीछे उनकी हल्की-सी मुड़ी हुई पूंछ आकाश में फैली हुई थी, जो गरुड़ द्वारा उठाए जा रहे एक विशाल सर्प के समान प्रतीत हो रही थी।
 
Behind the extremely swift Hanumanji, his slightly curled tail spread out in the sky and looked like a great serpent being carried by Garuda.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)