श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 1: हनुमान् जी के द्वारा समुद्र का लङ्घन, मैनाक के द्वारा उनका स्वागत, सुरसा पर उनकी विजय तथा सिंहिका का वध,लंका की शोभा देखना  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  5.1.30 
रामार्थं वानरार्थं च चिकीर्षन् कर्म दुष्करम्।
समुद्रस्य परं पारं दुष्प्रापं प्राप्तुमिच्छति॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
श्री रामजी और वानरों के कार्य की सिद्धि के लिए कठिन कार्य करने की इच्छा रखने वाला यह पवनपुत्र समुद्र के उस पार पहुँचना चाहता है, जहाँ जाना अत्यन्त कठिन है।॥30॥
 
This son of the wind, who desires to perform difficult tasks for the accomplishment of the task of Shri Rama and the monkeys, wants to reach the other shore of the ocean, where it is very difficult to go.'॥ 30॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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