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ramayan 5.1.27: विद्याधर और महर्षि अपनी महान विद्या (आकाश में बिना सहारे के खड़े रहने की शक्ति) का प्रदर्शन करते हुए आकाश में एक साथ खड़े होकर पर्वत की ओर देखने लगे॥ 27॥   |   ramayan सर्ग 5.1: हनुमान् जी के द्वारा समुद्र का लङ्घन, मैनाक के द्वारा उनका स्वागत, सुरसा पर उनकी विजय तथा सिंहिका का वध,लंका की शोभा देखना   ।   ramayan काण्ड 5: सुन्दर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 1: हनुमान् जी के द्वारा समुद्र का लङ्घन, मैनाक के द्वारा उनका स्वागत, सुरसा पर उनकी विजय तथा सिंहिका का वध,लंका की शोभा देखना  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  5.1.27 
दर्शयन्तो महाविद्यां विद्याधरमहर्षय:।
सहितास्तस्थुराकाशे वीक्षांचक्रुश्च पर्वतम्॥ २७॥
 
 
अनुवाद
विद्याधर और महर्षि अपनी महान विद्या (आकाश में बिना सहारे के खड़े रहने की शक्ति) का प्रदर्शन करते हुए आकाश में एक साथ खड़े होकर पर्वत की ओर देखने लगे॥ 27॥
 
Vidyadhar and Maharshi, demonstrating their great knowledge (the power to stand without support in the sky), stood together in the sky and looked towards the mountain.॥ 27॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)