श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 1: हनुमान् जी के द्वारा समुद्र का लङ्घन, मैनाक के द्वारा उनका स्वागत, सुरसा पर उनकी विजय तथा सिंहिका का वध,लंका की शोभा देखना  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  5.1.22 
भिद्यतेऽयं गिरिर्भूतैरिति मत्वा तपस्विन:।
त्रस्ता विद्याधरास्तस्मादुत्पेतु: स्त्रीगणै: सह॥ २२॥
 
 
अनुवाद
उस समय वहाँ रहने वाले तपस्वियों और विद्याधरों ने सोचा कि कोई दुष्टात्माएँ पर्वत को तोड़ रही हैं। इससे भयभीत होकर वे अपनी पत्नियों सहित वहाँ से उठकर अंतरिक्ष में चले गए।
 
At that time the ascetics and Vidyadhars residing there thought that the mountain was being broken by some evil spirits. Frightened by this, they along with their wives rose up from there and went into the space.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd