श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 1: हनुमान् जी के द्वारा समुद्र का लङ्घन, मैनाक के द्वारा उनका स्वागत, सुरसा पर उनकी विजय तथा सिंहिका का वध,लंका की शोभा देखना  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  5.1.21 
यानि त्वौषधजालानि तस्मिञ्जातानि पर्वते।
विषघ्नान्यपि नागानां न शेकु: शमितुं विषम्॥ २१॥
 
 
अनुवाद
उस पर्वत पर बहुत सी औषधियाँ उग रही थीं, परंतु विषनाशक होने पर भी वे उन सर्पों के विष को निष्फल नहीं कर सकती थीं ॥21॥
 
Many medicinal herbs were growing on that mountain, but in spite of being capable of destroying poisons, they could not neutralise the venom of those serpents. ॥ 21॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd