श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 1: हनुमान् जी के द्वारा समुद्र का लङ्घन, मैनाक के द्वारा उनका स्वागत, सुरसा पर उनकी विजय तथा सिंहिका का वध,लंका की शोभा देखना  »  श्लोक 208
 
 
श्लोक  5.1.208 
तत: शरीरं संक्षिप्य तन्महीधरसंनिभम्।
पुन: प्रकृतिमापेदे वीतमोह इवात्मवान्॥ २०८॥
 
 
अनुवाद
बुद्धिमान हनुमानजी ने अपना पर्वताकार शरीर छोटा कर लिया और पुनः अपने मूल स्वरूप में स्थित हो गए। ठीक उसी प्रकार जैसे आसक्ति से मुक्त होकर अपने मन को वश में करने वाला व्यक्ति अपने मूल स्वरूप में स्थित हो जाता है।
 
Hanuman, the wise man, shrank his mountainous body and once again became established in his original form. Just like a person who is free from attachments and controls his mind becomes established in his original form.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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