श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 1: हनुमान् जी के द्वारा समुद्र का लङ्घन, मैनाक के द्वारा उनका स्वागत, सुरसा पर उनकी विजय तथा सिंहिका का वध,लंका की शोभा देखना  »  श्लोक 205
 
 
श्लोक  5.1.205 
सागरं सागरानूपान् सागरानूपजान् द्रुमान्।
सागरस्य च पत्नीनां मुखान्यपि विलोकयत्॥ २०५॥
 
 
अनुवाद
उन्होंने समुद्र, उसके तट के जल-समृद्ध क्षेत्र, वहाँ उगते वृक्ष तथा समुद्र में गिरने वाली नदियों के मुहाने भी देखे।
 
He also saw the sea, the water-rich regions along its coast, the trees growing there and the mouths of the rivers that flow into the sea. 205.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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