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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 1: हनुमान् जी के द्वारा समुद्र का लङ्घन, मैनाक के द्वारा उनका स्वागत, सुरसा पर उनकी विजय तथा सिंहिका का वध,लंका की शोभा देखना  »  श्लोक 202
 
 
श्लोक  5.1.202 
स तै: सम्पूजित: पूज्य: प्रतिपन्नप्रयोजनै:।
जगामाकाशमाविश्य पन्नगाशनवत् कपि:॥ २०२॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार अपना उद्देश्य पूरा करके आकाश में उड़ने वाले प्राणियों ने हनुमान का बहुत आदर-सत्कार किया। इसके बाद वे आकाश में चढ़ गए और गरुड़ के समान गति से चलने लगे।
 
Having thus achieved their purpose, those creatures flying in the sky honoured Hanuman greatly. After this, he climbed into the sky and started moving with the speed of Garuda.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)