श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 1: हनुमान् जी के द्वारा समुद्र का लङ्घन, मैनाक के द्वारा उनका स्वागत, सुरसा पर उनकी विजय तथा सिंहिका का वध,लंका की शोभा देखना  »  श्लोक 186-188h
 
 
श्लोक  5.1.186-188h 
इति संचिन्त्य मनसा च्छायामस्य समाक्षिपत्॥ १८६॥
छायायां गृह्यमाणायां चिन्तयामास वानर:।
समाक्षिप्तोऽस्मि सहसा पङ्गूकृतपराक्रम:॥ १८७॥
प्रतिलोमेन वातेन महानौरिव सागरे।
 
 
अनुवाद
ऐसा मन में विचार करके उस राक्षसी ने हनुमानजी की छाया पकड़ ली। छाया पकड़ते ही वीर वानर हनुमानजी ने सोचा, 'अहा! मुझे अचानक किसने पकड़ लिया? इस पकड़ के आगे मेरा पराक्रम स्तब्ध हो गया है। जैसे प्रतिकूल वायु के आने पर समुद्र में जहाज की गति रुक ​​जाती है, वही दशा आज मेरी हो गई है।'॥186-187 1/2॥
 
Thinking so in her heart, the demoness caught hold of Hanuman's shadow. On catching the shadow, the brave monkey Hanuman thought, 'Oh! Who has caught me suddenly? My valour has become paralysed in front of this grip. Just as the movement of a ship in the sea is obstructed when there is unfavourable wind, the same condition has befallen me today.'॥ 186-187 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)