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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
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काण्ड 5: सुन्दर काण्ड
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सर्ग 1: हनुमान् जी के द्वारा समुद्र का लङ्घन, मैनाक के द्वारा उनका स्वागत, सुरसा पर उनकी विजय तथा सिंहिका का वध,लंका की शोभा देखना
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श्लोक 183-184h
श्लोक
5.1.183-184h
प्रदृश्यमान: सर्वत्र हनूमान् मारुतात्मज:॥ १८३॥
भेजेऽम्बरं निरालम्बं पक्षयुक्त इवाद्रिराट्।
अनुवाद
सर्वत्र दृष्टिगोचर होने वाले पवनपुत्र हनुमानजी आधारहीन आकाश में आश्रय लेकर पंखधारी पर्वतराज के समान आगे बढ़े। 183 1/2
Hanuman, the son of the wind, visible everywhere, moved ahead like the winged King of Mountains, taking shelter in the baseless sky. 183 1/2
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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