श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 5: सुन्दर काण्ड  »  सर्ग 1: हनुमान् जी के द्वारा समुद्र का लङ्घन, मैनाक के द्वारा उनका स्वागत, सुरसा पर उनकी विजय तथा सिंहिका का वध,लंका की शोभा देखना  »  श्लोक 150
 
 
श्लोक  5.1.150 
मम भक्ष्य: प्रदिष्टस्त्वमीश्वरैर्वानरर्षभ।
अहं त्वां भक्षयिष्यामि प्रविशेदं ममाननम्॥ १५०॥
 
 
अनुवाद
हे महान कपिश्रेष्ठ! देवताओं ने तुम्हें मेरे भोजन के रूप में अर्पित किया है, अतः मैं तुम्हें खाऊँगा। मेरे मुख में आओ॥150॥
 
O great Kapishreshtha! The gods have offered you to me as my food, so I will eat you. Come into my mouth.॥ 150॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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